आज भी दर-दर भटकने को मजबूर दिव्यांग, न तो पेशन बढ़ी न मिला रोजगार
Even today, the disabled are forced to wander from door to door, neither have their pensions increased nor have they found employment.

Bhopal divyangokiawaz.in
आज अंतराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस तो मनाया जा रहा है, लेकिन आज भी वे उनके अधिकार से वंचित है। दिव्यांगों के मिलने वाले रोजगार पर भी डाका डाला जा रहा है तो वहीं उनके लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध बजट भी ऐसे चंपत कर दिया जाता है, जैसे किसी को पता ही नहीं क्या चल रहा है, क्योंकि इनसे जबाव मांगने वाला कोई नहीं होता है तो इनके हौसले बुलंद है। आज भी गांवों, बस्तियों में रहने वाले दिव्यांगों को पता ही नहीं सरकार उनके लिए कितनी योजनाएं चला रहा है। आज महंगाई के युग में वह छह सौ रुपए पेंशन में अपना जीवनयापन कर रहे है इतने कम रुपए में उनका भरण पोषण नहीं हो पा रहा है। केंद्र और राज्य सरकार को इन दिव्यांगों के उत्थान के लिए कोई ऐसी योजना लानी होगी जिससे इनका जीवन सज संवर सके और उनके जीवन में रोशनी की नई किरण जागे और सरकार के प्रति उनका विश्वास बढ़े। आज भी कई गांवों में जब दिव्यांगजनों के लिए काम करने वाले लोग, अफसर जाते है तो वे एक ही जवाब देते है सरकार ने हमारे लिए किया क्या? सरकार को हमारी चिंता होती तो हमारी पेंशन दूसरे राज्यों की तरह 5 हजार होती, रोजगार के साधन बढ़ाए जाते, उनके इलाज के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं कराते। 80 फीसदी दिव्यांगों को स्कूटी दिलवाने के प्रयास करती है। अब बात हम करते है जिले के प्रशासन और जनप्रतिनिधि की ये सिर्फ दिव्यांग दिवस पर फोटो सेंशन दिव्यांगों के साथ करवाते है उसके बाद वे भूल जाते है कि हमने दिव्यांगों से क्या वादा किया था और दिव्यांग फिर अपनी दुर्दशा का शिकार होता रहता है।
दिव्यांगता विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देश में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। दिव्यांगता के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने के लिये संयुक्त राष्ट्र द्वारा 3 दिसंबर को विश्व दिव्यांग दिवस के रूप में घोषित किया गया है। यह राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आदि जैसे जीवन के हर पहलू में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों तथा उनके हितों को प्रोत्साहित करने की परिकल्पना करता है।
भारत में कई कानूनों और योजनाओं के माध्यम से दिव्यांग व्यक्तियों के लिये अवसरों की सुलभता और समानता सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। हालाँकि भारत अभी भी दिव्यांग व्यक्तियों के लिये अवसंरचनात्मक, संस्थागत और दृष्टिकोण/व्यवहार संबंधी बाधाओं को दूर करने में बहुत पीछे है।
दिव्यांगों से संबंधित विभिन्न कानूनों और अनुच्छेदों में समान अवसर, गरिमा और समाज में पूर्ण भागीदारी के अधिकार शामिल हैं। भारतीय संविधान में अनुच्छेद \(14\) और \(21\) दिव्यांगों को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देते हैं, और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 इस अधिकार को अधिक विशिष्ट बनाता है, जिसमें शिक्षा, रोजगार, और संपत्ति के अधिकार जैसे प्रावधान हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद \(16(4)\) के तहत पदोन्नति में आरक्षण का अधिकार भी माना है। भारतीय संविधान और कानून अनुच्छेद \(14\) और \(21\): गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार।दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016: दिव्यांगों के अधिकारों और समान अवसरों को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।यह अधिनियम शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दिव्यांगों की पूर्ण भागीदारी और समानता सुनिश्चित करता है।धारा \(13(1)\): दिव्यांगों को अन्य नागरिकों के समान ही संपत्ति के स्वामित्व, उत्तराधिकार, वित्तीय मामलों पर नियंत्रण, और बैंक ऋण तक पहुँच का अधिकार देता है।सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि दिव्यांग व्यक्तियों को पदोन्नति में आरक्षण का अधिकार है, जो अनुच्छेद \(16(4)\) के तहत आता है। अन्य संबंधित कानून राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999: ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता और बहुदिव्यांगता वाले व्यक्तियों के कल्याण के लिए है।भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992: पुनर्वास पेशेवरों के प्रशिक्षण और योग्यता के लिए भारतीय पुनर्वास परिषद के गठन का प्रावधान करता है। महत्वपूर्ण सिद्धांत पहुंच: दिव्यांग व्यक्तियों को स्वतंत्रतापूर्वक जीवन जीने और समाज में भाग लेने के लिए सुलभ वातावरण महत्वपूर्ण है।सक्षमता और पुनर्वास: दिव्यांगजनों को अधिकतम स्वतंत्रता, पूर्ण शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और व्यावसायिक क्षमता हासिल करने में सक्षम बनाने के लिए प्रभावी और उचित उपाय किए जाने चाहिए।
चुनौतियाँ:
संस्थागत अड़चनें: वर्तमान में भी देश में दिव्यांगता के संदर्भ में जागरूकता, देखभाल, अच्छी और सुलभ चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी बनी हुई है। इसके अतिरिक्त पुनर्वास सेवाओं की पहुँच, उपलब्धता और सदुपयोग में भी कमी देखी गई है।
ये कारक दिव्यांग लोगों के लिये निवारक और उपचारात्मक ढाँचा सुनिश्चित करने में बाधक बने हुए हैं।
शिथिल कार्यान्वयन: सरकार द्वारा दिव्यांग व्यक्तियों की स्थिति में सुधार के लिये कई सराहनीय पहलों की शुरुआत की गई है।



